#दीपावली पहले हर त्योहार पर घर पर मीठे पुए पापड, शक्करपारे,लापसी, गुजिए, सिलोनिया बनती थी पुर्ण रुपेन गृहनिर्मित पकवान होते थे त्योहार के एक दो दिन पहले जब घर पर माताजी ये सब बनाती थी तो लगता था कि त्योहार आ रहा है घर पर मातृशक्ति के मन में भी इनको बनाने का चाव रहता था बच्चों के मन में इन्हे कब चखे ये इंतजार रहता था l मातृशक्ति रन्गोली बनाती थी l लेकिन आज के त्यौहार पुरे बाजारु (क्षमा इस शब्द के प्रयोग के लिए )त्योहार हो गये हैं l घर सजाने का सामान, खाने पिने का सामान, महन्गी मिठाईया सब कुछ बाजार पर निर्भर l सब बना बनाया तैयार l ना बनाने का चाव, ना सजाने का चाव l रह गयी तो चिन्ता l खर्चे की l त्योहार आते ही सिर भारी l अपने देवी देवताओ हिन्दु ग्रन्थो को तो बदनाम कर ही चुके थे अब बारी है त्योहारो की l दीवाली आते ही कहेन्गे कि दीवाली नही दीवाला l मिलावटखोर जिन्होंने अघोषित ठेका ले रखा है बाजार मे पुर्ति का l अब ये नही होते तो इतना (नक़ली )मावा निर्मित मिठाइया कहा से आती l क्यों कि गाय भैस (पशुपालन ) को पालना तो हमने पहले ही छोड़ दिया है अब इतना मावा दुध आएगा कहाँ से l अभी भी वक्त ...
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